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वन पर्व
अध्याय १४९
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वैशम्पाय़न उवाच
विस्मय़श्चैव मे वीर सुमहान्मनसोऽद्य वै |  १४   क
यद्रामस्त्वय़ि पार्श्वस्थे स्वय़ं रावणमभ्यगात् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति