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शान्ति पर्व
अध्याय १४८
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वृहस्पतिरु उवाच
छिद्राणि वसनस्येव साधुना विवृणोति यः |  ३२   क
यः पापं पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति