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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
सुतस्तवाव्रवीद्राजन्सारथिं रथिनां वरः |  १२   क
यत्रैष शव्दस्तत्राश्वांश्चोदय़ेति पुनः पुनः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति