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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
सिंहनादभय़त्रस्तैः कुञ्जरैरपि भारत |  ५८   क
मुक्तो विरावः सुमहान्पर्वतो येन पूरितः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति