वन पर्व  अध्याय १४६

वैशम्पाय़न उवाच

मनोज्ञे काननवरे सर्वभूतमनोरमे |  २   क
पादपैः पुष्पविकचैः फलभारावनामितैः ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति