वन पर्व  अध्याय १४६

वैशम्पाय़न उवाच

एतत्तु धर्मराजाय़ प्रदास्यामि परन्तप |  १०   क
हरेरिदं मे कामाय़ काम्यके पुनराश्रमे ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति