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अनुशासन पर्व
अध्याय १४६
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वासुदेव उवाच
नित्येन व्रह्मचर्येण लिङ्गमस्य यदा स्थितम् |  १५   क
महय़न्त्यस्य लोकाश्च महेश्वर इति स्मृतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति