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आदि पर्व
अध्याय १४६
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व्राह्मण्यु उवाच
तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीह सुखावहम् |  ५   क
भवत्यमुत्र चाक्षय़्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति