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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
ते विद्ध्वा धन्विना तेन धृष्टद्युम्नं पुनर्मृधे |  १९   क
विव्यधुः पञ्चभिस्तूर्णमेकैको रथिनां वरः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति