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द्रोण पर्व
अध्याय १४५
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सञ्जय़ उवाच
विकृष्य च धनुश्चित्रमाकर्णात्परवीरहा |  १०   क
द्रोणस्यान्तकरं घोरं व्यसृजत्साय़कं ततः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति