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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
स तैः प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभिः |  ३४   क
प्रय़तः प्रतिगृह्याथ धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति