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अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
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वासुदेव उवाच
भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च |  १६   क
ऋषय़ः सर्वभूतानामात्मनश्च हितैषिणः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति