आदि पर्व  अध्याय १४५

व्राह्मण उवाच

धिगिदं जीवितं लोकेऽनलसारमनर्थकम् |  २०   क
दुःखमूलं पराधीनं भृशमप्रिय़भागि च ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति