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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भ्रातरोऽस्य महारथाः |  ३९   क
अन्ववर्तन्त वेगेन महत्या सेनय़ा सह ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति