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द्रोण पर्व
अध्याय १४१
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सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठ न मे जीवन्द्रोणपुत्र गमिष्यसि |  १५   क
एष त्वाद्य हनिष्यामि महिषं स्कन्दराडिव |  १५   ख
युद्धश्रद्धामहं तेऽद्य विनेष्यामि रणाजिरे ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति