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उद्योग पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
दिव्या माय़ा विहिता भौवनेन; समुच्छ्रिता इन्द्रकेतुप्रकाशा |  ४   क
दिव्यानि भूतानि भय़ावहानि; दृश्यन्ति चैवात्र भय़ानकानि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति