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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
स संनिपातस्तुमुलो वभूवाद्भुतदर्शनः |  ३०   क
सात्यकेश्चैव शूरस्य मद्राणामधिपस्य च |  ३०   ख
यादृशो वै पुरा वृत्तः शम्वरामरराजय़ोः ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति