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शल्य पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु सशरं चापं नकुलस्य महात्मनः |  १९   क
मद्रेश्वरः क्षुरप्रेण तदा चिच्छेद मारिष |  १९   ख
तदशीर्यत विच्छिन्नं धनुः शल्यस्य साय़कैः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति