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कर्ण पर्व
अध्याय १४
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सञ्जय़ उवाच
शरीरैर्वहुधा भिन्नैः शोणितौघपरिप्लुतैः |  ३८   क
गतासुभिरमित्रघ्न संवृता रणभूमय़ः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति