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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
नाहं त्वत्तो वरं काङ्क्षे नान्यस्मादपि दैवतात् |  ९४   क
महादेवादृते सौम्य सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||  ९४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति