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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
विभूषितं पुण्यपवित्रतोय़या; सदा च जुष्टं नृप जह्नुकन्यया |  ३७   क
महात्मभिर्धर्मभृतां वरिष्ठै; र्महर्षिभिर्भूषितमग्निकल्पैः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति