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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
प्रसीद मम भक्तस्य दीनस्य कृपणस्य च |  १६४   क
अनैश्वर्येण युक्तस्य गतिर्भव सनातन ||  १६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति