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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
यस्य व्रह्मा च विष्णुश्च त्वं चापि सह दैवतैः |  १०२   क
अर्चय़ध्वं सदा लिङ्गं तस्माच्छ्रेष्ठतमो हि सः ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति