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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
शुश्रूषध्वं व्राह्मणेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर |  १०   क
त्वं चापगेय़ नामानि निशामय़ जगत्पतेः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति