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द्रोण पर्व
अध्याय १३९
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सञ्जय़ उवाच
आचार्यो हि सुसंय़त्तो भृशं यत्ताश्च पाण्डवाः |  २०   क
तं रक्षत सुसंय़त्ता निघ्नन्तं शात्रवान्रणे ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति