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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरेण भल्लेन ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् |  १८   क
वाह्लीकस्य रणे राजन्सात्यकिः प्रहसन्निव ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति