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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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युधिष्ठिर उवाच
विषमस्थं हि राजानं शत्रवः परिपन्थिनः |  ५   क
वहवोऽप्येकमुद्धर्तुं यतन्ते पूर्वतापिताः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति