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शान्ति पर्व
अध्याय १३६
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भीष्म उवाच
व्रवीति मधुरं कञ्चित्प्रिय़ो मे ह भवानिति |  १४४   क
तन्मिथ्याकरणं सर्वं विस्तरेणापि मे शृणु ||  १४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति