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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
न भय़ं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति |  १२७   क
भवत्यरोगो द्युतिमान्वलरूपगुणान्वितः ||  १२७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति