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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
एष राजा महावाहुरमर्षी क्रोधमूर्छितः |  ६२   क
पतङ्गवृत्तिमास्थाय़ फल्गुनं योद्धुमिच्छति ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति