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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
सत्यमुक्तं त्वय़ा व्रह्मन्पाण्डवान्प्रति यद्वचः |  ४५   क
एते चान्ये च वहवो गुणाः पाण्डुसुतेषु वै ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति