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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फल्गुनस्य रणाजिरे |  १८   क
कथमुत्सहसे जेतुं सकृष्णान्सर्वपाण्डवान् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति