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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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कर्ण उवाच
मय़ि जीवति कौरव्य विषादं मा कृथाः क्वचित् |  १०   क
अहं जेष्यामि समरे सहितान्सर्वपाण्डवान् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति