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वन पर्व
अध्याय १३३
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अष्टावक्र उवाच
ऐन्द्रद्युम्नेर्यज्ञदृशाविहावां; विवक्षू वै जनकेन्द्रं दिदृक्षू |  ४   क
न वै क्रोधाद्व्याधिनैवोत्तमेन; संय़ोजय़ द्वारपाल क्षणेन ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति