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वन पर्व
अध्याय १३३
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अष्टावक्र उवाच
दिदृक्षुरस्मि सम्प्राप्तो वन्दिनं राजसंसदि |  १३   क
निवेदय़स्व मां द्वाःस्थ राज्ञे पुष्करमालिने ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति