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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
उपक्रामति जन्तूंश्च उद्वेगजननः सदा |  ३४   क
एवंशीलसमाचारो निरय़ं प्रतिपद्यते ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति