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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
लोष्टैः स्तम्भैरुपाय़ैर्वा जन्तून्वाधति शोभने |  ३३   क
हिंसार्थं निकृतिप्रज्ञः प्रोद्वेजय़ति चैव ह ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति