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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
क्षिप्तानि क्षिप्यमाणानि तानि चास्त्राणि धर्मजः |  ३०   क
जघानास्त्रैर्महावाहुः कुम्भय़ोनेरवित्रसन् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति