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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
अथ चेन्निरय़ात्तस्मात्समुत्तरति कर्हिचित् |  ५२   क
मानुष्यं लभते चापि हीनाय़ुस्तत्र जाय़ते ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति