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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं वीक्ष्य ये नराः |  ३०   क
मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति