वन पर्व  अध्याय १३१

श्येन उवाच

इन्द्रोऽहमस्मि धर्मज्ञ कपोतो हव्यवाडय़म् |  २८   क
जिज्ञासमानौ धर्मे त्वां यज्ञवाटमुपागतौ ||  २८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति