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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
स्थण्डिले शुद्धमाकाशं परिगृह्य समन्ततः |  ४५   क
प्रविश्य च मुदा युक्तो दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति