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अनुशासन पर्व
अध्याय १३०
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महेश्वर उवाच
एष धर्मो मय़ा देवि वानप्रस्थाश्रितः शुभः |  १९   क
विस्तरेणार्थसम्पन्नो यथास्थूलमुदाहृतः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति