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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
माय़ाशतसृजौ दृप्तौ माय़ाभिरितरेतरम् |  ४२   क
अन्तर्हितौ चेरतुस्तौ भृशं विस्मय़कारिणौ ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति