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भीष्म पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
अष्टपञ्चाशतं राजन्विपुलत्वेन चानघ |  ४४   क
श्रूय़ते परमोदारः पतङ्गोऽसौ विभावसुः |  ४४   ख
एतत्प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति