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वन पर्व
अध्याय १३
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अर्जुन उवाच
तां च भोगवतीं पुण्यामृषिकान्तां जनार्दन |  ३१   क
द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमय़िष्यसि ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति