सभा पर्व  अध्याय १३

श्रीकृष्ण उवाच

वय़ं चैव महाराज जरासन्धभय़ात्तदा |  ६५   क
मथुरां सम्परित्यज्य गता द्वारवतीं पुरीम् ||  ६५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति