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द्रोण पर्व
अध्याय १२९
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे महाशव्दनिनादिते |  ३३   क
भीरूणां त्रासजनने शूराणां हर्षवर्धने ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति