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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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महेश्वर उवाच
न स्तम्भी न च मानी यो न प्रमत्तो न विस्मितः |  ५५   क
मित्रामित्रसमो मैत्रो यः स धर्मविदुत्तमः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति