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अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
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महेश्वर उवाच
एष चक्रचरैर्देवि देवलोकचरैर्द्विजैः |  ४७   क
ऋषिधर्मः सदा चीर्णो योऽन्यस्तमपि मे शृणु ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति